लंका रामलीला मैदान के पास निकला प्राचीन कुआं,संरक्षण की उठी मांग
वाराणसी।
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कुंडों,तालाबों और कुओं की नगरी काशी, जिसे प्राचीन काल में आनंद कानन वन के नाम से भी जाना जाता था,जहां कभी जलस्रोतों की भरमार थी। समय के साथ काशी के अनेक प्राचीन कुएं और जलकूप अस्तित्व खोते जा रहे हैं।ऐसे में नगर के कुओं को संरक्षित करने के लिए महापौर और नगर आयुक्त की पहल सराहनीय है।

इसी बीच बीएचयू लंका गेट से रविंद्रपुरी कॉलोनी होते हुए कीनाराम स्थली तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण अभियान के दौरान लंका रामलीला मैदान के पास एक प्राचीन कुआं सामने आया है।स्थानीय लोगों के अनुसार यह कुआं काफी प्राचीन है और इसका संबंध गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित रामलीला परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।लंका रामलीला में भगवान राम और रावण के युद्ध की लीला का मंचन किया जाता है।

मान्यता है कि रामलीला में तैयार होने वाले स्वरूप इसी क्षेत्र में विश्राम करते हैं और इस कुएं के पानी का उपयोग भी करते हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि कुएं का पानी आज भी बेहद शीतल और निर्मल है।नगर के प्राचीन कुंडों और तालाबों को बचाने के लिए लंबे समय से प्रयासरत समाजसेवी रामयश मिश्र ने महापौर और नगर आयुक्त से इस प्राचीन जलकूप को भी संरक्षित करने की अपील की है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह नगर के अन्य प्राचीन कुओं को संरक्षण देने की पहल की जा रही है,उसी क्रम में रामलीला मैदान के पास मिले इस कुएं को भी सुरक्षित किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि यह कुआं केवल जलस्रोत नहीं,बल्कि काशी की धार्मिक,सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।सड़क चौड़ीकरण के दौरान इसका अस्तित्व प्रभावित न हो,इसके लिए संबंधित अधिकारियों को संरक्षण की दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।

















