आधुनिकता की भेंट चढ़ती जा रही कजरी और सावन का झूला… 

आधुनिकता की भेंट चढ़ती जा रही कजरी और सावन का झूला… 

# नई नस्लों के लिए किस्सा और कहानी बनती जा रही है पुरानी सभ्यता और रीति रिवाज

स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
              वर्षा ऋतु के सबसे सुहावने मौसम सावन माह में काले घनेरे मेघों को देखकर मन मयूर अनायास ही पंख लगाकर कजरी की ऊंगली पकडे़ झूला झूलने लगता है। यह ऐसा मौसम होता है जब गांव की महिलाएं कजरी गीतों के माध्यम से अपने प्रियतम से मान मनुहार करती हैं। कजरी में विरह, विलाप, मिलन, प्रेम रस, सौन्दर्य रस व वीर रस आदि जैसे अनेकों परम्परागत राग होतें हैं। ठुमरी, मल्हार को इसके सबसे अधिक प्रचलित रागों में गिना जाता है।
सावन के महीने में जब तन मन पर रिमझिम फुहार पड़तीं है तब मन एक आलौकिक आनंद से भर जाता है। मन बरबस ही गा उठता है “हरे रामा खेतवा में करब किसानी, मिल के दुनो परानी नऽ” सावन की फुहार पड़ते ही गांव गिराव की महिलाएँ झूला डाल कर जब उस पर बैठकर कजरी गीत गाती तो पूरा माहौल ही झूम उठता था। एक सहेली दूसरी सहेली से मनुहार करते हुए कहती थी “कइसे खेलै जइबू सावन में कजरियां, बदरिया गिर आई रे सखी” कजरी के गीतों में राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम का वर्णन, राम-सीता के आलौकिक सौन्दर्य का वर्णन और शंकर-पार्वती के रूठने मनाने का वर्णन महिलाएँ बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती थी।
कितने ही भोजपुरी गायकों एवं गायिकाओं ने कजरी के गीतों को ही अपना पसंदीदा गीत बना डाला। शास्त्रीय संगीत के गायकों ने इस गंवई गीत को अपनाकर खुब शोहरत भी हासिल की। कुछ शास्त्रीय संगीत के गायकों द्वारा गाई गयी कजरी इतनी मशहूर हुई कि आज भी लोग उसे सुन कर झूम उठते हैं।
कजरी, फगुआ जैसे गीत गांव गिरांव से जुड़े हुए आम बोल-चाल की भाषा में गाया जानें वाला गीत माना जाता है। इसमें एक तरफ़ यदि विरह होता है तो दूसरी तरफ़ मिलन का रस भी मिलता है। एक तरफ जहां सौंदर्य रस है तो वहीं दूसरी तरफ़ वीर रस भी। कजरी एक लोक गायन नही बल्कि एक भारतीय परम्परा है जिसमें सामाजिक समरसता, विरह वेदना, सौदर्य का अनोखा संगम है।
लगभग दो दशक पहले सावन का महीना शुरू होतें ही हर गांव में कजरी की धूम होती थी। गांव की महिलाएँ जब झूले पर बैठकर मान मनुहार के द्वारा कजरी गाती तो मेघ भी मतवाला हो कर रस बरसाने लगता था। मोर भी अपने आप को रोक नहीं पाता था और नाचने लगता था। लेकिन बदलते दौर और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कजरी जैसी पुरानी सभ्यता रूपी परंपरा कहीं खोती नजर आ रही है।

कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया पर रील्स और मीम्स के नशे की गिरफ्त में मशगूल नई पीढ़ी के लिए पुरानी परंपराओं की अनदेखी और उन्हें आउटडेटेड समझ लेना ही आधुनिकता का परिचायक हो गया है। ऐसे में प्रकृति संग मानव के मेल, सहचर्य और एक दूसरे का पर्याय होने की दुहाई कब तक दी जा सकेगी, कहना मुश्किल है। प्रकृति पूजक समाज की हमारी सांस्कृतिक पहचान लुप्त हुई तो परिणाम विनिष्टकारी ही होंगे। मौसम का बेतरह रूठना इसकी बानगी है। जरूरी है कि पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से प्रेम करना सिखाए क्योंकि यही उनके मन में मानवता के प्रति प्रेम पैदा करने की पहली सीढ़ी है।
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