जौनपुर : अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा नार्मल मैदान का शहीद स्तंभ
# शहीद स्तंभ के जीर्णोद्वार के लिए जिलाधिकारी को सौंपा गया था पत्रक
केराकत।
विनोद कुमार
तहलका 24×7
महात्मा गांधी के नेतृत्व में 8 अगस्त 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजते ही देश की जनता नई क्रांति की इबादत लिखने को बेताब हो उठी। क्रांति की इस लड़ाई में जौनपुर की तहसील केराकत के शूरवीरों ने भी भारत माँ को आजाद कराने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सेदारी की थी।अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों और संघर्ष से केराकत के शूरवीरों ने अंग्रेजो के खिलाफ जबरदस्त हमला किया और अंग्रेजी हुकूमत को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिए। अंग्रेज़ी हुकूमत की दमनकारी नीति क्रांतिकारियों का यह आंदोलन नागवार गुजरा।

क्रांतिकारियों के लगातार हमले से खफा अंग्रेजी हुकूमत ने क्रांतिकारियों पर गोलियों की बौछार कर दी। इस गोलीकांड में जौनपुर के विभिन्न क्षेत्रों के ग्यारह वीर योद्धाओं ने अपनी आहुति दी और शहीद होकर इतिहास के पन्नो में अपना नाम अमर कर गए। इन अमर शहीदों की याद में केराकत नगर के नार्मल मैदान में शहीद स्मारक की स्थापना की गई है पर अफसोस होता है कि भारत छोड़ो आंदोलन में अपना बलिदान देने वाले इन शूरवीरों की याद में बना शहीद स्तम्भ आज की तारीख में जीर्ण-शीर्ण हो चुका हैं। जिन क्रान्तिकारियों ने देश के लिए खुद को समर्पित किया आज उनके बलिदान को जीर्ण शीर्ण होकर अपमानित होना पड़ रहा है, जबकि पत्रकार का एक दल शहीद स्तंभ को विस्थापित कर जीर्णोद्वार के लिये जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा से मिल पत्रक सौंप मांग की गई थी पर नगर पंचायत द्वारा धन का अभाव दिखाकर मामले को निस्तारण कर दिया गया।

शहीद स्तम्भ की स्थिति को देखकर मन-मस्तिष्क में एक ही प्रश्न बार-बार कौंधता है कि देश के लिए शहीद होने वाले वीर सपूतों को आजाद देश द्वारा इसी तरह का सम्मान और स्थान मिलता है।शहीद स्तंभ की स्थिति देख दिल सिहर उठता है मन एक ही सवाल पैदा होता है कि क्या देश के लिये शहीद होने वाले वीर सपूतों के शहादत को आजाद भारत में यही सम्मान मिलता है? साल में दो बार गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस को शहीद स्तंभ की रंगाई पुताई की जाती है और शहीद स्तंभ पर ध्वजारोहण उपजिलाधिकारी के द्वारा किया जाता है पर अफसोस होता है कि ध्वजारोहण करने आये उपजिलाधिकारी का ध्यान राष्ट्रीय ध्वज के फहरने पर तो पड़ता है मगर उपेक्षित पड़े शहीद स्तंभ पर नहीं पड़ता है क्या जिम्मेदार अधिकारी व जनप्रतिनिधि जानबूझकर उपेक्षित पड़े शहीद स्तंभ को नजर अंदाज करते है?

















