मनरेगा के नाम व प्रावधानों में संशोधन का ग्राम प्रधानों ने किया विरोध

मनरेगा के नाम व प्रावधानों में संशोधन का ग्राम प्रधानों ने किया विरोध

खेतासराय, जौनपुर।
डॉ. सुरेश कुमार 
तहलका 24×7 
              विकास खण्ड शाहगंज सोंधी के ग्राम प्रधानों ने मनरेगा के नाम और प्रावधानों में किए गए संशोधन को एक सुर में खारिज कर दिया है। ग्राम प्रधानों का कहना है कि नाम बदलने में समस्या नहीं है, लेकिन नियमों को बदलना हित में नहीं। नए नियमों से न केवल ग्राम पंचायतों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, बल्कि ग्रामीण श्रमिकों के हितों को भी गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
20 वर्ष पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम बदलकर विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण बिल 2025 (वीबी-जी रामजी) कर दिया गया है। यह संशोधन विधेयक गुरुवार को शीतकालीन सत्र में विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद करीब 14 घण्टे की चर्चा के बाद पारित हुआ। सरकार द्वारा जहां इसे लोकहित में बताया जा रहा है, वहीं ग्रामीण स्तर पर जनप्रतिनिधियों में गहरी असंतुष्टि देखी जा रही है।
ग्राम प्रधान यूनुसपुर परमानंद का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी जहां 500 रुपये तक है, वहीं मनरेगा में वर्तमान मजदूरी 252 रुपये है। नए संशोधन में मजदूरी बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। पहले योजना के तहत 100 दिनों तक बिना किसी रोक-टोक के रोजगार की गारंटी थी, लेकिन नए नियमों में 60 दिनों का ब्रेक तय कर दिया गया है। प्रधानों के अनुसार यह ब्रेक उसी समय लागू किया गया है जब खेत खाली रहते हैं और कच्चे कार्य कराए जा सकते थे, उसी समय कार्य पर रोक है। जबकि फसल खड़ी होने पर कार्य कर पाना संभव नहीं होता।
प्रधान संघ के अशोक कुमार ने बताया कि पहले मनरेगा में 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, जबकि संशोधित विधेयक के तहत अब 60 प्रतिशत केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करना होगा। इससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा और ग्राम पंचायतों में धन की कमी हो जाएगी, जिसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ेगा।प्रधान पोरई खुर्द कृपाशंकर ने आरोप लगाया कि संशोधित विधेयक में कार्य चयन की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई है।
पहले ग्राम पंचायतें खुली बैठकों के माध्यम से कार्यों का चयन करती थीं, लेकिन अब कार्यों की प्राथमिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा। जिससे पंचायतों का आवश्यक कार्य बाधित होगा। ग्राम प्रधानों का कहना है कि मनरेगा योजना पहले पूरी तरह मांग आधारित थी, जिसमें किसी प्रकार की सीमा निर्धारित नहीं थी। नए बदलाव के तहत किस राज्य को कितनी धनराशि मिलेगी, इसका निर्णय केंद्र सरकार करेगी, जिससे भविष्य में राज्यों के साथ भेदभाव की आशंका बढ़ सकती है।
वहीं रोजगार सेवक संघ के ब्लॉक अध्यक्ष निशानाथ ने बताया कि नए विधेयक में मनरेगा कर्मियों के मानदेय, भत्तों और सुविधाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है, जो निराशाजनक है। रोजगार सेवक उमाकांत ने बताया कि सरकार रोजगार सेवकों को मानदेय बढ़ाने का प्राविधान करे या उनको स्थाई करके राज्य कर्मचारी का दर्जा दे।मनरेगा श्रमिक रितेश यादव ने कहा कि 252 रुपये की मजदूरी में परिवार का भरण-पोषण करना संभव नहीं है। नए नियमों से श्रमिकों के लिए कोई उम्मीद की किरण नहीं जगी है और अब पलायन ही एकमात्र विकल्प बचता नजर आ रहा है।
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