विलुप्त होने की कगार पर कैथा वृक्ष,संरक्षण की आवश्यकता
# कभी गांवों की पहचान होने वाला कैथा अब दुर्लभ होता जा रहा है
खेतासराय, जौनपुर।
डॉ. सुरेश कुमार
तहलका 24×7
ग्रामीण भारत की जैविक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाने वाला कैथा (वुड एप्पल) का पेड़ आज धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रहा है।एक समय था जब गाँवों,खेतों की मेड़ों, बाग-बगीचों और विद्यालयों के आस-पास कैथा के पेड़ सहज ही दिखाई देते थे,बदलती जीवनशैली,शहरीकरण और पारंपरिक वृक्षों के प्रति घटती रुचि के कारण अब इसकी संख्या लगातार कम होती जा रही है।

कैथा का वैज्ञानिक नाम लिमोनिया एसिडीसीमा है। इसे अंग्रेजी में वुड एप्पल कहा जाता है।संस्कृत में यह कपित्थ तथा हिंदी में कठबेल या कैथा के नाम से प्रसिद्ध है।यह रुटेसी कुल का पौधा है।इसके पुराने वैज्ञानिक नाम फेरोनिया लोमोनिया तथा फेरोनिया एलफंटूम भी प्रचलित रहे हैं।आज भी अधिकांश लोगों की स्मृतियों में कैथा का विशेष स्थान है।स्कूलों के बाहर लगने वाले पाचक और चाट के ठेलों पर कैथा का उपयोग आज भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाता है।

इसका खट्टा-मीठा स्वाद बच्चों और बड़ों दोनों को आकर्षित करता है।विशेषज्ञों के अनुसार कैथा केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं,बल्कि पोषण और औषधीय गुणों से भी भरपूर है।इसके फल में विभिन्न प्रकार के खनिज, विटामिन तथा पाचन में सहायक तत्व पाए जाते हैं। आयुर्वेदिक ग्रंथों में कपित्थ (कैथा) का उल्लेख अनेक रोगों में उपयोगी फल के रुप में मिलता है।पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इसे पाचन तंत्र को मजबूत करने, भूख बढ़ाने तथा पेट संबंधी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है।कैथा का अचार भारतीय ग्रामीण खान-पान की एक अनूठी विरासत माना जाता है।

इसका खट्टा-तीखा स्वाद भोजन का आनंद बढ़ाने के साथ पाचन में भी सहायक माना जाता है।ग्रामीण महिलाओं द्वारा पीढ़ियों से तैयार किया जाने वाला कैथा का अचार आज भी कई घरों में विशेष पसंद किया जाता है।खेतासराय क्षेत्र के गोरारी ख़लीलपुर निवासी पूर्व प्रधान आनंद बरनवाल बताते है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी परंपरागत विधि के अनुसार कैथा के गूदे को काटकर धूप में सुखाया जाता है और फिर सरसों,मेथी, सौंफ,हींग,लाल मिर्च तथा अन्य मसालों के साथ सरसों के तेल में मिलाकर अचार तैयार किया जाता है।

उचित देखभाल के साथ यह अचार लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।लेकिन विडंबना है कि यह पेड़ अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है।जिसका संरक्षण और संवर्धन बेहद जरुरी है।कैथा का पेड़ केवल फल देने वाला वृक्ष नहीं है,बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।यह सूखा सहन करने की क्षमता रखता है तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में भी आसानी से विकसित हो जाता है।इसकी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करती हैं और यह स्थानीय जैव विविधता को भी समृद्ध बनाता है।

वनस्पति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस वृक्ष के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल पुस्तकों और चित्रों में ही देख पाएंगी।पर्यावरण प्रेमियों और कृषि विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे अपने खेतों,बगीचों,विद्यालय परिसरों तथा सार्वजनिक स्थानों पर कैथा के पौधे लगाएं।इसके संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाने तथा स्थानीय स्तर पर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक भारतीय वृक्षों का संरक्षण केवल पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं,बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए भी आवश्यक है।कैथा का पेड़ भारतीय ग्रामीण जीवन, लोक संस्कृति,पारंपरिक खान-पान और आयुर्वेदिक ज्ञान का जीवंत प्रतीक है।यदि समाज और प्रशासन मिलकर इसके संरक्षण का संकल्प लें,तो यह अमूल्य प्राकृतिक धरोहर फिर से हमारे गांवों और शहरों की पहचान बन सकती है।एक पेड़ कैथा का लगाइए,आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की इस अनमोल विरासत को बचाइए।
















