वोटर लिस्ट के लिए आधार, वोटर आईडी को वैध दस्तावेज मानने पर विचार करे चुनाव आयोग : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली।
तहलका 24×7
सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को लेकर तीखे सवाल किए और चुनाव आयोग से कहा कि वह चल रहे अभियान के तहत मतदाता गणना के लिए आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को वैध दस्तावेजों के रुप में शामिल करने पर विचार करे। कोर्ट ने कहा, प्रथम दृष्टया उसकी राय है कि न्याय हित में चुनाव आयोग को बिहार में मतदाता सूची के चल रहे पुनरीक्षण के दौरान आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र आदि जैसे दस्तावेजों को भी शामिल करने पर विचार करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इस प्रक्रिया में आधार को वैध दस्तावेज के रूप में शामिल किए जाने के संदर्भ में तर्क दिया कि यह एक निश्चित बात का प्रमाण है कि मैं मैं हूं, या आप आप हैं! जस्टिस धूलिया ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम कहता है कि इसे एक वैध दस्तावेज के रुप में लिया जाना चाहिए। पहला सवाल नागरिकता का है, मुझे एक दस्तावेज दिखाना होगा कि यह मेरा घर है, संपत्ति है, बिक्री पत्र है। दूसरा सवाल यह है कि क्या मैं वही व्यक्ति हूं, जिसका मैं दावा कर रहा हूं? इसलिए प्रत्येक दस्तावेज का एक उद्देश्य होता है।

60 प्रतिशत फॉर्म भरे जा चुके हैं और लगभग 5.5 से 6 करोड़ फॉर्म पहले ही भरे जा चुके हैं और उनमें से आधे अपलोड हो चुके हैं। उन्होंने आधार अधिनियम का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि आधार संख्या या प्रमाणीकरण अपने आप में आधार के संबंध में नागरिकता या निवास के प्रमाण के रुप में कोई अधिकार प्रदान नहीं करता है। न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा उदाहरण के लिए मुझे एक जाति चाहिए और इसके लिए मैं अपना आधार कार्ड दिखाऊंगा। उसके आधार पर मुझे जाति प्रमाण पत्र मिलेगा, जाति प्रमाण पत्र ग्यारह दस्तावेजों (SIR अभ्यास के लिए आवश्यक) में से एक में है। लेकिन आधार उसमें नहीं है।

जस्टिस धूलिया ने कहा, इतने सारे दस्तावेज प्राप्त करने का आधार बनने वाले बुनियादी दस्तावेजों में से एक पर केन्द्रीय चुनाव आयोग विचार नहीं कर रहा है। इस पर द्विवेदी ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह से आधार नहीं है और सूची संपूर्ण नहीं है, लेकिन आधार के लिए चुनाव आयोग को इसे नागरिकता या निवास के प्रमाण के रुप में मानने से मना किया गया है। पीठ ने आगे पूछा कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित करने के बाद क्या यह संभव है कि किसी का नाम उसमें शामिल न हो। इस पर द्विवेदी ने जवाब दिया कि यह संभव नहीं है।

जस्टिस धूलिया ने पूछा, मान लीजिए, मैं एक मतदाता था और अक्टूबर 2024 और जनवरी 2025 में संशोधन के बाद मेरा नाम उसमें था और जब आप एक अगस्त को मसौदा प्रकाशित करेंगे, तो क्या मेरा नाम उसमें होगा?वरिष्ठ वकील ने जवाब दिया कि नाम उसमें होगा और इसके लिए एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करने होंगे। हम घर-घर जा रहे हैं और इसके लिए लाखों लोगों को नियुक्त किया है।पीठ ने कहा कि संभावना है कि कुछ नाम गायब होंगे और बताया कि चुनाव आयोग का तर्क यह है कि 2005 की सूची वर्तमान प्रक्रिया में नामों को शामिल करने का आश्वासन नहीं है।

द्विवेदी ने तर्क दिया कि मतदाता सूची का अंतिम पुनरीक्षण 2003 में हुआ था और वर्तमान में गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता है।द्विवेदी ने एसआईआर की आवश्यकता पर जोर देते हुए तर्क दिया कि कुछ याचिकाओं में कहा गया है कि लगभग 1.1 करोड़ लोग मारे गए हैं, 70 लाख लोग पलायन कर गए हैं और इस पृष्ठभूमि में यह अपने आप में गहन पुनरीक्षण का मामला बनता है। अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह सुनवाई 28 जुलाई को होगी। इसमें आधार, मतदाता सूची और राशन कार्ड को भी शामिल करने की मांग की गई है।

उन्होंने बताया कि अदालत ने कहा है कि अगर चुनाव आयोग चाहे तो इन तीनों दस्तावेजों को स्वीकार कर सकता है। यह चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। चुनाव आयोग ने आश्वासन दिया है कि वह बिहार चुनाव से पहले यह प्रक्रिया पूरी कर लेगा।बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग को बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के कार्य को जारी रखने की अनुमति दे दी है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 21 जुलाई तक का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।

जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव से कुछ महीने पहले ही संशोधन शुरु करने के चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कदम लोकतंत्र और मतदान की शक्ति की जड़ों पर प्रहार करता है। जस्टिस धूलिया ने चुनाव के इतने करीब वोटर लिस्ट में संशोधन के संभावित प्रभावों की ओर इशारा करते हुए कहा, अगर आपको बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के तहत नागरिकता की जांच करनी थी, तो आपको पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी। अब थोड़ी देर हो चुकी है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं (जिनमें विपक्षी नेता और नागरिक समाज समूह शामिल हैं) की इस दलील को खारिज कर दिया कि चुनाव आयोग के पास इस तरह का संशोधन का अधिकार नहीं है।

पीठ ने कहा कि वोटल लिस्ट में संशोधन करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है और इस बात पर जोर दिया कि बिहार में पिछली बार ऐसा 2003 में किया गया था।सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने एसआईआर का बचाव करते हुए कहा कि पात्र मतदाताओं को जोड़कर और अपात्र मतदाताओं को हटाकर मतदाता सूची की अखंडता बनाए रखना आवश्यक है। आयोग ने दोहराया कि आधार नागरिकता का वैध प्रमाण नहीं है, कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार केवल भारतीय नागरिक ही मतदान के हकदार हैं। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील द्विवेदी ने सवाल किया कि अगर चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार नहीं है, तो फिर किसके पास है?


















