सोन चिरैया बागों में फूट फूटकर रोती है
अरे शिकारी! तुमने चिड़ियों का जीवन ही लील लिया।
सोनचिरैया बागों में फूट-फूट कर रोती हैं।
कुछ अनजानी दाना चुगने के लालच में निकल पड़ी।
कुछ जबरन लायी जाने से हो निशीथ में विकल पड़ी।
कुछ गिद्धों का भोजन बनकर अधनंगी बेहोश मिली।
पड़ी विपत्ति एक शत्रु से कभी द्विकल या त्रिकल पड़ी।
अपनेपन से और परायों से निशदिन ही छली गयी।
भाग्यशालिनी कहलाकर भी निज अस्मत को खोती हैं।।1।।
किसकी रक्षा कौन करे जब बाड़ खेत को खाती है।
चारदिवारी में भी खुद को नहीं सुरक्षित पाती है।
तार तार मर्यादा सारी रिश्ते नाते भूल गए।
इसीलिए मासूम मौत के घाट उतारी जाती है।
इन वीभत्स कर्मों की छाया खुद से दूर हटाने को।
बहन बेटियां निज देहों को रक्तकुंड में धोती हैं।।2।।
अरे बागबाँ! इन शिकारियों को पहचानो और रोको।
मेरी इज्जत अपनी इज्जत है ये मानो और रोको।
भारत का इतिहास कलंकित मत होने देना भाई।
दुष्ट दंड के पात्र रहेंगे बस ये ठानो और रोको।
सामाजिकता, सरोकारिता मानवता व्यवहारिकता।
अपने तन से तीन हाथ लंबी चादर में सोती है।।3।।
राहुल राज मिश्र (स. अ.)
कवि/ गीतकार
राजकीय उ.मा.वि सवायन जौनपुर
















