उमस भरी गर्मी के दौरान पौने चौदह घण्टे के रोज़े में होगा सब्र का इम्तिहान

उमस भरी गर्मी के दौरान पौने चौदह घण्टे के रोज़े में होगा सब्र का इम्तिहान

# मुकद्दस महीने में होती है मुल्क की सलामती के लिए दुआएं

स्पेशल डेस्क।
अज़ीम सिद्दीकी
तहलका 24×7
                 हमारे देश में विभिन्न त्योहार मनाएं जाते हैं इन सभी त्योहारों का अपना- अपना महत्व होता है। उसी तरह से रमजान यह इस्लाम धर्म का सबसे प्रसिद्ध महीना है। रमज़ान का महीना हर मुस्लमान के लिए पावन और महत्वपूर्ण होता है। मुसलमानों के बारह महीनों में नौवे महीने का नाम रमज़ान है। रमज़ान का महीना बड़ा ही पवित्र माना जाता है।

इस बार रमजान का महीना भीषण उमस व तपिश भरी गर्मी में शुरू हो रहा है। इस भीषण तपिश में रोजेदारों को कठिन इम्तिहान से गुजरना होगा। माह- ए- रमजान का शुभारंभ रविवार से होगा। गर्मी भी धीरे- धीरे अपने चरम पर है। इसमें रोजेदारों को भूख- प्यास की तड़प को सहन कर अल्लाह की रजा के लिए सब्र का इम्तिहान देना पड़ेगा। रोजेदार भूख- प्यास की तड़प को अल्लाह की रज़ा के लिए कुर्बान करते है। रमज़ान में मस्जिदों में नमाजियों की संख्या बढ़ जाती है। खासकर इस महीने में अदा होने वाली विशेष नमाज़ तरावीह में काफी लोग शामिल होते है।

इबादतों के जरिये अल्लाह को राजी करने की कोशिश होगी। अल्लाह की रहमत बन्दों पर उतरेगी। तेज़ धूप व उमस भरी गर्मी में रोज़ा से पहले लोगो में उत्साह है। रोजेदार अपने मुल्क की सलामती के लिए दुआएं मांगते है। गरीबों यतीमों, बेसहारा लोगों की मदद करते है। इबादतगाहों के साथ ही मस्जिदों से लेकर घरों में कुरान की आयतों की गूंज गूँजती है। रोजेदारों द्वारा बरकत के इस महीने में देर रात तक तरावीह पढ़ी जाती हैं। इस महीने में हर मुसलमान अपने दिल से रोजे रखते है। रमज़ान का महीना 30 दिनों का होता है। रमज़ान के महीने को तीन भागो में विभाजित किया गया है। जो प्रथम, द्वितीय और तृतीया भागो को इस्लामिक भाषा में अशरा कहा जाता है। पहला अशरा 10 दिन का होता है, दूसरा अशरा 11-20 में दूसरा अशरा और तीसरे दिन 21-30 में विभाजित किया गया है। रमजान के महीने में 3 अशरे होते है पहला अशरा रहमत का जिसमे अल्लाह की कृपा होती है, दूसरे अशरे में मगफिरत की होती है, जिसमे अल्लाह हर मुस्लमान के गुनाहों को माफ़ करता है। तीसरे अशरे में जहनुम की पीड़ा से खुद को बचा सकते है।

रमज़ान के पहले दस दिन अत्यंत ज़रूरी होते है। इन रहमत के दिनों में हर मुस्लमान गरीबो और जरुरतमंदो की सहायता करता है। हर एक इंसान इन दिनों में विनम्रतापूर्वक बातचीत करता है। सभी की इज़्ज़त करता है और सदव्यवहार से सबके मन जीत लेता है। रमज़ान के दूसरे अशरा माफ़ी का होता है। कहते है इस अशरे में अल्लाह दूसरे दिनों के मुकाबले इस वक़्त अपने बन्दों को जल्द माफ़ कर देता है। इस्लामिक रीति- रिवाज़ के अनुसार यहाँ लोगों को अपने किये हुए पापों से मुक्ति मिल जाती है। तीसरा अशरा जहनुम से खुद को मुक्त करना होता है। यहाँ लोग अल्लाह से इबादत करते है की उन्हें जहनुम से बक्श दे।

इस अशरे में 10 दिनों तक लोग एक ही जगह बैठकर अल्लाह को पुकारते है तथा एतेकाफ में बैठकर इबादत करते है। औरतें घर पर रहकर नमाज़ पढ़ती है। रोजे के दौरान संयम का तात्पर्य है कि आँख, कान, नाक, जुबान का भी रोज़ा होता है। इनको नियंत्रण में रखा जाता हैं। क्योंकि रोज़े के दौरान बुरा न सुनना, बुरा न देखना, न बुरा बोलना और न ही बुरा अहसास किया जाता है। इस तरह से रमज़ान के रोज़े मुस्लिम समुदाय को उनकी धार्मिक श्रद्धा के साथ- साथ बुरी आदतो को छोड़ने के साथ ही आत्म सयंम रखना सिखाते है। इसके साथ ही साथ यह भी मान्यता है कि गर्मी में रोजेदारों के पाप धूप की अग्नि में जल जाते है तथा मन पवित्र हो जाता है और सारे बुरे विचार रोज़े के दौरान मन से दूर हो जाते है।

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