पद्मश्री साहित्यकार की दर्दनाक विदाई: 80 करोड़ की संपत्ति, 400 से अधिक पुस्तकें, फिर भी अंतिम समय में अकेले रह गए श्रीनाथ खंडेलवाल
वाराणसी।
तहलका 24×7
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं,बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों और रिश्तों की संवेदनहीनता का आईना है।आध्यात्मिक साहित्य के क्षेत्र में अपनी अमिट पहचान बनाने वाले,400 से अधिक पुस्तकों के लेखक और पद्मश्री सम्मान से अलंकृत वरिष्ठ साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल का जीवन जिस पीड़ा के साथ समाप्त हुआ,उसने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर दिया है।

बताया जाता है कि करोड़ों रुपये की संपत्ति के स्वामी रहे श्रीनाथ खंडेलवाल अपने जीवन के अंतिम दिनों में वाराणसी के एक वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर थे।उम्र और बीमारी के बोझ से जूझ रहे इस साहित्य साधक ने वहीं अंतिम सांस ली।सबसे दुखद पहलू रहा कि उनके निधन की सूचना मिलने के बावजूद उनके बेटे और बेटी अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं पहुंचे।स्थानीय लोगों के अनुसार,श्रीनाथ खंडेलवाल ने अपना पूरा जीवन साहित्य,अध्यात्म और समाज को समर्पित कर दिया।

उनकी रचनाओं ने लाखों पाठकों को प्रेरित किया, लेकिन जीवन की सांझ में उन्हें अपने ही परिवार से उपेक्षा का सामना करना पड़ा।कहा जाता है कि संपत्ति विवाद के बाद उन्हें घर से अलग कर दिया गया था और वे वृद्धाश्रम में रहने लगे थे।जब उनके निधन की खबर परिजन तक पहुंचाई गई तो बेटे ने व्यस्तता का हवाला दिया,जबकि बेटी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद वृद्धाश्रम के संचालकों,समाजसेवियों और स्थानीय नागरिकों ने मिलकर चंदा इकट्ठा किया और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया।

वृद्धाश्रम से जुड़े लोगों का कहना है कि अंतिम दिनों में भी श्रीनाथ खंडेलवाल साहित्य और अध्यात्म की चर्चा करते थे।उनके मन में समाज और मानवता के प्रति वही प्रेम था,जिसने उन्हें जीवनभर लेखनी से जोड़े रखा। उनकी मृत्यु ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आधुनिक जीवन की दौड़ में रिश्तों की संवेदनाएं इतनी कमजोर हो गई हैं कि माता-पिता के अंतिम समय में भी अपनों का साथ न मिल सके?

साहित्य जगत के लिए यह अपूरणीय क्षति है, वहीं समाज के लिए आत्ममंथन का विषय भी। करोड़ों की संपत्ति, प्रतिष्ठा और सम्मान पाने वाले एक लेखक की अंतिम यात्रा तब पूरी हुई, जब समाज ने परिवार की जगह अपना कर्तव्य निभाया।श्रीनाथ खंडेलवाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी लेखनी, उनके विचार और उनकी पीड़ा समाज को लंबे समय तक सोचने पर मजबूर करती रहेगी।


















