भरत तिवारी एनकाउंटर: बिहार में बना बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा
भोजपुर।
तहलका 24×7
शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत ने बिहार की राजनीति,प्रशासन और समाज में तीखी बहस छेड़ दी है।घटना के बाद जहां परिजनों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताया है,वहीं ग्रामीणों के विरोध प्रदर्शन,सड़क जाम और पथराव की घटनाओं ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।बढ़ते विवाद के बीच सरकार को न्यायिक जांच का आदेश देना पड़ा है।

पुलिस के अनुसार भरत तिवारी के पास अवैध हथियार होने और सोशल मीडिया पर हथियार लहराने की सूचना मिली थी।उसे पकड़ने के लिए शाहपुर पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम गांव पहुंची।पुलिस का दावा है कि भरत ने फायरिंग की,जिसके जवाब में कार्रवाई हुई और वह घायल हो गया।बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों के बाद पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े हो गए।

आरोप लगाया गया कि भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था,इसके बावजूद उसे गोली मारी गई।अब तक सार्वजनिक रुप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार कार्रवाई में शाहपुर थाना पुलिस और बिहार एसटीएफ की संयुक्त टीम शामिल थी।हालांकि सरकार या पुलिस मुख्यालय ने आधिकारिक रुप से सभी अधिकारियों और जवानों की विस्तृत सूची सार्वजनिक नहीं की है।विवाद बढ़ने के बाद पुलिस प्रशासन ने प्रारंभिक कार्रवाई करते हुए शाहपुर थाना प्रभारी राजेश मालाकार को निलंबित कर दिया।

कार्रवाई में शामिल कुछ पुलिसकर्मियों को भी लाइन हाजिर,निलंबित किए जाने की खबरें सामने आईं।राज्य सरकार ने न्यायिक जांच कराने की घोषणा की है। मामले में केवल विपक्ष ही नहीं,बल्कि सत्ता पक्ष के नेताओं ने भी सवाल उठाए।बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि यदि कार्रवाई जरूरी थी तो “हाफ एनकाउंटर” किया जा सकता था,सीधे जान लेना उचित नहीं लगता।सत्ताधारी गठबंधन से जुड़े कई नेताओं ने निष्पक्ष जांच की मांग की।

बढ़ते दबाव के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को न्यायिक जांच की घोषणा करनी पड़ी।विपक्ष ने घटना को सरकार की कानून-व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था की विफलता बताया।पूर्व सांसद पप्पू यादव ने भरत तिवारी को “आज का भगत सिंह” बताते हुए एनकाउंटर पर गंभीर सवाल उठाए।विपक्षी दलों ने इसे कथित फर्जी मुठभेड़ बताते हुए दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की मांग की। घटना के बाद ग्रामीणों और आम लोगों में भारी नाराजगी देखी गई।

पूर्व डीजीपी अभयानंद और गुप्तेश्वर पांडेय सहित कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।कुछ पूर्व अधिकारियों ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग तक कर डाली।सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में लोगों ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।भरत तिवारी का शव गांव पहुंचते ही माहौल तनावपूर्ण हो गया।ग्रामीणों ने शव को सड़क पर रखकर आरा-बक्सर फोरलेन और एनएच-922 को जाम कर दिया।

जिससे कई घंटों तक यातायात बाधित रहा।प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई।पथराव और तनावपूर्ण हालात का भी सामना करना पड़ा।बाद में पुलिस ने सड़क जाम के मामले में 14 नामजद और लगभग 50 अज्ञात लोगों पर एफआईआर दर्ज की।भरत तिवारी के परिजनों का कहना है कि जब भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था। पुलिस ने उसे पकड़ने के बाद गोली मारी।जो वायरल वीडियो पुलिस के दावों पर सवाल खड़ा करता है।यह मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या है।

परिवार का यह भी आरोप है कि विरोध प्रदर्शन के बाद उल्टे उनके खिलाफ ही मुकदमे दर्ज कर दिए गए।पिता और भाई का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया है।परिजन और ग्रामीण लगातार मांग कर रहे हैं कि एनकाउंटर की न्यायिक जांच कराई जाए।गोली चलाने वाले पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो।दोषी अधिकारियों को गिरफ्तार किया जाए।परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए।जांच की निगरानी किसी स्वतंत्र एजेंसी या मानवाधिकार आयोग से कराई जाए।

फिलहाल मामला अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंच गया है।शिकायत में निष्पक्ष जांच और पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता की जांच की मांग की गई है।
फिलहाल भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है।वायरल वीडियो,परिजनों के आरोप,ग्रामीणों का उग्र विरोध, सत्ता और विपक्ष दोनों की ओर से उठे सवाल तथा न्यायिक जांच की घोषणा ने इसे बिहार के सबसे चर्चित मामलों में शामिल कर दिया है।अब सबकी निगाहें न्यायिक जांच और एनएचआरसी की संभावित कार्रवाई पर टिकी हैं।


















