शहीद बाबू गंगा सिंह को नहीं जानती पूर्वांचल की नई पीढ़ी
# अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे महान क्रांतिकारी ने
# ईनाम की लालच में ईमान बेचकर साथी ने करा दिया था गिरफ्तार
# वरिष्ठ पत्रकार एख़लाक खान की कलम से…
“उनकी तुर्बत पर नहीं जलते एक भी दिए, जिनके खून से जलते थे चिराग़- ए- वतन। जगमगा रहे हैं आज उनके मकबरे, जो बेचा करते थे शहीदों का कफन।” आजाद हिन्दुस्तान में आजादी के आंदोलन के अपराजेय योद्धाओं की उपेक्षा से आहत राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” ये पंक्तियाँ जिले के शाहगंज तहसील के ताखा पूरब गांव की माटी के लाल व अंग्रेज़ी हुकूमत की नजर में दुर्दांत क्रांतिकारी बाबू गंगा सिंह पर तपे हुए खरे सोने की तरह खरी उतरती है। सत्ता सरकार के रहनुमाओं, शासन प्रशासन के हुक्मरानों समेत शायद ही कोई अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाले इस वीर क्रांतिकारी के व्यक्तित्व और क्रिया-कलापों से दो चार हो।
शाहगंज तहसील के अंतिम छोर पर स्थित ताखा पूरब गांव में बीसवीं सदी के प्रथम दशक में कृषक बाल्मीकि सिंह के घर बाबू गंगा सिंह का जन्म हुआ। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने शिक्षक जीवन प्रारम्भ किया। वर्ष 1930 में पड़ोस के गांव कटार में उन्होंने एक विद्यालय की नींव रखी। वर्ष 1939 में महात्मा गांधी ने हैदराबाद में सत्याग्रह आंदोलन की शुरूआत की। बाबू गंगा सिंह स्कूल छोड़कर आंदोलन में भाग लेने निकल पड़े। जहां से लौटने के बाद वह कांग्रेस में शामिल होकर पूर्वांचल में आजादी की लड़ाई में सक्रिय हो गए।
थोड़े समय के बाद ही बाबू गंगा सिंह अहिंसक गांधीवादी से क्रांतिकारी बन गए। बताते हैं कि वर्ष 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस शाहगंज आए जहां साथियों के साथ बाबू गंगा सिंह उन्हें लेकर आजमगढ़ जिले के फूलपुर गए जहां क्रांतिकारियों के बीच नेताजी ने भारी भीड़ के बीच जोशीला भाषण दिया। जोशीले भाषण का असर साथियों पर ऐसा पड़ा कि सभी लोग सरफरोशी की तमन्ना लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में कूद पड़े।
वर्ष 1942 में शाहगंज बिलवाई के बीच गंगा सिंह ने साथियों के साथ मिलकर रेल पटरी उखाड़ ट्रेन को बेपटरी कर दिया। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खजाने लूट लिया। इसके अलावा आजमगढ़ के फूलपुर रेलवे-स्टेशन लूटा, ट्रेन से जा रहे सरकारी खजाने को बाबतपुर में लूटा। जिसे आजादी की लड़ाई में खर्च करने के लिए चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के पास पहुंचा दिया। ताबड़तोड़ खजाने लूटने से अंग्रेजों के होश उड़ गये। अब उनकी निगाह में गंगा सिंह खटकने लगे। जिनकी गिरफ्तारी के लिए जाल बिछाया जाने लगा।
एक अंग्रेजपरस्त थानेदार अली हसन ने बाबू गंगा सिंह को पकड़ने का बीड़ा उठाया। थानेदार गाँव के लोगों को आतंकित और प्रताड़ित करने लगा। जिसकी खबर लगते ही बाबू गंगा सिंह क्रोधित हो उठे। बताते हैं कि एक शाम घोड़े पर सवार होकर बाबू गंगा सिंह थाने पहुंच गए, जहां थानेदार को इतनी भयानक फटकार लगाई की वह अपनी पैंट में ही मल कर बैठा। इस घटना से पूरे जिले में सनसनी फैल गई।
ट्रेन पलटने और खजानों को लूटने में बाबू गंगा सिंह जहां पूर्वांचल में सुर्खियों में आ गए वहीं अंग्रेजों की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में नाम दर्ज हो गया। अंग्रेज पुलिस हाथ धोकर गंगा सिंह के पीछे पड़ गई। पुलिस से बचने के लिए वह पैदल ही सुल्तानपुर जिले के सूरापुर में क्रांतिकारी साथी जय गोपाल सिंह के बंगले में शरण ली। जहां कुछ ही घंटों के भीतर शाहगंज, बदलापुर, सरपतहां थानों की अंग्रेज पुलिस ने छापा मारा लेकिन गंगा सिंह वेश बदलकर निकलने में कामयाब हो गए।
बौखलाई पुलिस ने ईनाम की घोषणा की। इसी ईनाम की लालच में गंगा सिंह के ही एक साथी ने ईमान बेचकर गद्दारी कर दिया। जो बाबू गंगा सिंह को बनारस से गिरफ्तार करा दिया। जिन्हें बनारस से आजमगढ़ जेल लाया गया। जहां यातना के रूप में क्रूर अंग्रेजी शासन ने शीशा पिघलाकर जबरन हलक के नीचे उतार दिया। परिणाम स्वरूप वर्ष 1943 में वो वीरगति को प्राप्त हो गए।
बेहद दुःखद रूप से पूर्वांचल के इस महान क्रांतिकारी सपूत का आभा मंडल शासन प्रशासन की उपेक्षा, सत्ता सरकारों का नकारापन, जन प्रतिनिधियों का स्वकेन्द्रीय नजरिया और आधुनिक समाज की चकाचौंध में गुम होकर रह गया। गांव निवासी विन्ध्याचल सिंह, आद्या प्रसाद सिंह, ठाकुर विनय सिंह बताते हैं कि शहीद बाबू गंगा सिंह की प्रतिमा व स्मारक निर्माण के लिए काफी प्रयास किया गया, लेकिन नतीजा शून्य रहा।