सुल्तानपुर : वाल्मीकि विश्व के पहले लोक कवि- डॉ सुशील कुमार पाण्डेय
# अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने वाल्मीकि जयंती पर आयोजित किया समारोह
कादीपुर।
मुन्नू बरनवाल
तहलका 24×7
वाल्मीकि विश्व साहित्य के पहले लोक कवि हैं। उनका काव्य सदैव प्रेरणा देता है उक्त बातें वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु ने कहीं। वे अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा वाल्मीकि जयंती पर आयोजित संगोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित कर रहे थे।

विशिष्ट वक्ता राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि ने कहा कि वाल्मीकि भारतीय संस्कृति के पहले प्रचारक हैं। वाल्मीकि विश्व के पहले महाकवि हैं उनका काव्य मानवतावादी काव्य है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जिलाध्यक्ष मथुरा प्रसाद सिंह जटायु के आवास पर दो सत्रों में आयोजित इस समारोह में प्रथम सत्र विचार गोष्ठी व द्वितीय सत्र कवि गोष्ठी का था।
कवि गोष्ठी में अपनी कविता सुनाते हुए परिषद के जिलाध्यक्ष मथुरा प्रसाद सिंह जटायु ने कहा काजल की कोठरी सरीखी राजनीति लगती, जो कच्ची गोलियां खेलता है उसको ठगती। ओंकार नाथ श्रीवास्तव ने सुनाया कवि हूं सत्य का हथियार लिए फिरता हूं,वीर अभिमन्यु की जवानी हूं मैं। डॉ करूणेश भट्ट ने सस्वर पाठ करते हुए सुनाया स्वार्थ में ढलता रहा है आदमी का हर प्रहर ,मिल गया है आदमी के दिल में कैसा जहर। ब्रजेश कुमार पाण्डेय इन्दु ने अपनी व्यंग्य रचना सुनाते हुए कहा गर्भस्थ सिसू के जे हक मारैं,विधवा पेन्सन ओर निहारै। दमा दरेरई मिरगी आवै ,हांफै डांफै अउ अललाइ।

पवन कुमार सिंह ने दोहा सुनाते हुए कहा वाल्मीकि आदि कवि,रामायण सत्काव्य। ईश कृपा उनपर हुई,रचे काव्य सम्भाव्य।अनिल कुमार वर्मा मधुर की पंक्तियां थीं वेदना से विहग के पीड़ित हुआ, बह चली करूणा हृदय की गीत में।राज बहादुर राना ने कहा कि वो हिन्दुस्तान कहां है मैं उसको ढूंढ रहा हूं। इन्दु सुलतानपुरी ने वाणी वंदना की। डॉ.सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु, ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि, सर्वेश कांत वर्मा व अशोक कुमार ने भी अपनी कविताएं सुनाईं।


















