सुल्तानपुर : दम्भ मुक्त जीवन ही है भगवान को प्रिय- संतोष जी महाराज
बेलवाई।
दीपक जायसवाल
तहलका 24×7
क्षेत्र अंतर्गत एतिहासिक भुवनेश्वरनाथ धाम बेलवाई में देवदीप मानव उत्थान सेवा समिति के तत्वावधान में चल रही सप्त दिवसीय श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा व्यास पूज्य संतोष जी महाराज ने श्रीराम चरितमानस की दो स्त्री पात्र एक ताड़का और दूसरी सूपर्णखा का तत्व विवेचन प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि ताड़का अंदर और बाहर दोनों तरफ से एक समान थी उसका कोई अलग से दूसरा चेहरा नहीं था इसलिए भगवान ने उसको एक ही बार में मार कर उसको जीवन से मुक्त कर दिया और भगवान उस पर दया भाव रखते हुए अपने श्री चरणों में स्थान दिया।
“एकहि बाण प्राण हर लीन्हा दीन जानि निज पद हरि दीन्हा” वहीं सूपर्णखा को भगवान ने मारा नहीं उसकी नाक कान काट कर उसको दर-दर की ठोकर खाने के लिए छोड़ दिया।

सूपर्णखा जब शीशे में अपने चेहरे को देखती थी तो उसको बहुत पीड़ा होती थी ताड़का की अपेक्षा सूर्पनखा को बहुत बड़ा दंड मिला क्योंकि ताड़का एक ही बार में मर गई लेकिन सूर्पनखा रोज मरती थी और रोज जीती थी और जीवन भर अपयश का बोझ ढोती रही। जब भगवान से यह पूछा गया कि आपने सूर्पनखा को इतना बड़ा दंड क्यों दिया तो भगवान ने उत्तर दिया सूर्पनखा सज्जनता की आड़ में समाज को धोखा देती थी वह एक देवी का चेहरा रखती थी लोगों को अपना बनाने के लिए और एक राक्षसी का चेहरा रखती थी। यही कारण है कि भगवान को ताड़का से इतनी तकलीफ नहीं हुई। इसके बाद कथा व्यास संतोष महाराज जी ने अहिल्या उद्धार की कथा सुनाते हुए धनुष भंग की कथा को सुनाया।

इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक दिलीप मोदनवाल के साथ डॉ विजय सिंह, शिवनारायण गिरी, डॉक्टर लाल चंद्र दुबे, दिनेश मिश्रा, अनिल सिंह, जय शंकर शुक्ला उदय नारायण सिंह, कतारु बिंद, महेंद्र प्रताप सिंह, विनोद मोदनवाल, सोनू मौर्या, प्रदीप, श्रीनाथ अग्रहरि, दीपक जायसवाल, अरविंद सिंह, रवि त्रिपाठी, विकास अग्रहरि आदि श्रोता उपस्थित रहे। रामकथा के अध्यक्ष दुर्गेश राधे रमण मिश्र जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया।

















