बारिश से पहले खपरैल घर बचाने की जंग में जुटे ग्रामीण
# परम्परा,गरीबी और सरकारी उदासीनता की मार्मिक तस्वीर
खेतासराय, जौनपुर।
डॉ. सुरेश कुमार
तहलका 24×7
आसमान में घिरते काले बादल,तेज होती हवाएं और मिट्टी की सोंधी महक,शहरों में यह मौसम सुकून और राहत का एहसास कराता है,लेकिन गांवों के सैकड़ों गरीब परिवारों के लिए यही बादल बेचैनी,चिंता और अनिश्चितता का संदेश लेकर आते हैं।मानसून की पहली बारिश से पहले जनपद के खेतासराय क्षेत्र के आस-पास गांवों में इन दिनों हर सुबह एक अनोखा दृश्य दिखाई देता है।जर्जर खपरैल मकानों की छतों पर पुरुष जान जोखिम में डालकर चढ़े हैं।

महिलाएं नीचे मिट्टी और भूसे का गारा तैयार कर रही हैं। बच्चे टूटी खपरैल,बांस और ईंटें पकड़ाते हुए अपने हिस्से का श्रम दे रहे हैं।यह केवल छत की मरम्मत नहीं, बल्कि उस आशियाने को बचाने की जद्दोजहद है,जिसके नीचे पूरा परिवार अपने सपनों और संघर्षों के साथ जीवन बिताता है।ग्रामीणों के लिए बारिश किसी उत्सव का मौसम नहीं होती,बल्कि एक ऐसी परीक्षा होती है जिसका सामना उन्हें हर साल करना पड़ता है।उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि छत की एक छोटी-सी दरार भी पूरी रात की नींद छीन सकती है।

तेज बारिश शुरू होते ही घर के भीतर टपकता पानी, भीगे बिस्तर,खराब होता अनाज,बुझता चूल्हा और ठंड से कांपते बच्चे उनकी मजबूरी की सबसे दर्दनाक तस्वीर बन जाते हैं।किसान रामहित कहते हैं,हम लोग हर साल यह लड़ाई लड़ते हैं।बरसात आने से पहले छत नहीं सुधारी तो पूरी रात बाल्टी और बर्तन बदलते हुए कटती है।कई बार बच्चों की किताबें,कपड़े और महीनों का रखा अनाज तक भीग जाता है।पक्का मकान बनवाने की हमारी हैसियत नहीं है,इसलिए हर साल उसी पुरानी छत को फिर से जोड़ना हमारी मजबूरी बन गई है।

सुंदरी देवी की आवाज़ भर्रा जाती है।वह कहती हैं,हमारे लिए बरसात खुशी नहीं,डर लेकर आती है।रातभर बच्चों को गोद में लेकर बैठना पड़ता है ताकि वे भीग न जाएं। चूल्हा नहीं जलता,बिस्तर सूखते नहीं और कई बार सांप-बिच्छू भी घर में घुस आते हैं।तब लगता है कि गरीब की सबसे बड़ी चिंता रोटी नहीं,अपनी छत बचाना है।जवाहरलाल बताते हैं कि पहले खपरैल, बांस और लकड़ी गांव में ही सस्ते मिल जाते थे,लेकिन अब इनकी कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि मरम्मत कराना भी कठिन हो गया है।

मजदूर रखना संभव नहीं,इसलिए पूरा परिवार मिलकर छत की मरम्मत करता है।यदि लगातार दो-तीन दिन बारिश हो जाए तो मिट्टी की दीवारें गलने लगती हैं और पूरा घर असुरक्षित हो जाता है।महंगाई ने इस संघर्ष को और कठिन बना दिया है।खेती की आय लगातार घट रही है,मजदूरी से मुश्किल से घर का खर्च चल पाता है। ऐसे में हर साल खपरैल,बांस,लकड़ी और मरम्मत पर होने वाला खर्च गरीब परिवारों के लिए किसी पहाड़ से कम नहीं है।पक्का मकान आज भी उनके लिए एक ऐसा सपना है,जो हर बरसात के साथ और दूर होता जाता है।

इसके बावजूद गांवों की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका सामूहिक सहयोग है।किसी एक घर की छत टूटती है तो पूरा मोहल्ला उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।पड़ोसी बिना बुलाए मदद के लिए पहुंच जाते हैं।महिलाएं मिट्टी तैयार करती हैं,बच्चे सामान पहुंचाते हैं और पुरुष मिलकर छत दुरुस्त करते हैं।अभाव के बीच यही अपनापन गांव की असली पहचान बनकर सामने आता है।ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत सरकारी आवास योजनाओं को लेकर है।गोरारी निवासी सुनीता कहती हैं,कई बार आवेदन किया,सभी कागजात जमा किए, लेकिन आज तक नाम सूची में नहीं आया।

हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है।महरौड़ा के रमेश का कहना है कि गांव में कई ऐसे परिवार हैं जो वास्तव में पक्के मकान के हकदार हैं,लेकिन उन्हें आज तक लाभ नहीं मिला,जबकि कुछ ऐसे लोगों को योजना का फायदा मिल गया जिनके पास पहले से पक्के मकान हैं।इस सम्बंध में आनंद बरनवाल बताते है कि आने वाले दिनों में खपरैल का घर सपना होकर इतिहास के अध्याय में जुड़ जाएगा।जो भी बचे उनके बचाने और सवारने के लिए कारीगर और सामान मिलना मुश्किल हो जाता है और यदि किसी तरह कही से मिल भी रहा है तो उसके दाम बहुत बहुत महंगे है।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि अब खपरैल की जगह टीनशेड,पन्नी आदि उसकी जगह ले लिए है। अब ज्यादातर लोग सरकार के तरफ से मिलें अनुदान के बहाने पक्का मकान बनाने की कोशिश करते है।लेकिन पहले जो कच्चे मकान में सुकून और राहत होती थी वह अब बचे नहीं है और सपना होता चला जा रहा है।सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि पात्र परिवारों का निष्पक्ष सत्यापन कर समय पर आवास उपलब्ध कराया जाए,मानसून से पहले कच्चे मकानों की मरम्मत के लिए विशेष सहायता दी जाए,निर्माण सामग्री पर अनुदान मिले और योजनाओं में पूरी पारदर्शिता लाई जाए,तो हर साल हजारों गरीब परिवार इस भय से मुक्त हो सकते हैं।

यह केवल आवास का प्रश्न नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का भी सवाल है।खपरैल मकान केवल मिट्टी,बांस और खपरैल से बनी चार दीवारें नहीं हैं।वे गांव की संस्कृति,परंपरा और प्रकृति के साथ सामंजस्य की जीवंत मिसाल हैं।गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म रहने वाले ये मकान आज भी पर्यावरण के अनुकूल माने जाते हैं।विडंबना यह है कि जो मकान कभी ग्रामीण जीवन की पहचान थे,वही आज गरीबी और सरकारी उदासीनता के सबसे बड़े प्रतीक बन गए हैं।

बरसात की पहली बूंद गिरने से पहले गांवों की छतों पर चल रही यह हलचल केवल मरम्मत का काम नहीं है। यह उन हाथों की कहानी है जो हर साल अपनी टूटी छत के साथ अपने टूटते सपनों को भी जोड़ते हैं।यह उन आंखों की कहानी है जो हर मानसून से पहले आसमान की ओर देखकर यही दुआ करती हैं कि इस बार बारिश थोड़ी कम हो।आखिर कब तक गरीब परिवार हर साल अपनी छत बचाने के लिए प्रकृति और गरीबी से एक साथ लड़ते रहेंगे? यह सवाल केवल गांवों का नहीं, बल्कि हमारी विकास यात्रा के उस अधूरे सच का भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
















