टीडी कालेज स्थित म्युजियम का अवलोकन किया मशहूर इतिहासकार एस. एम. मासूम ने..

टीडी कालेज स्थित म्युजियम का अवलोकन किया मशहूर इतिहासकार एस. एम. मासूम ने..

# प्राचार्य से औपचारिक मुलाकात की कहानी एस. एम. मासूम की जुबानी..

सुनता था की तिलकधारी कालेज में एक म्यूजियम है जिसमें जौनपुर और आसपास से मिली कुछ मूर्तियां मौजूद है लेकिन यह अब बंद रहता है। आज जब टीडी कालेज पहुंचा तो मन में यह ख्याल आया की चलो प्राचार्य महोदय से मिल लिया जाय और उनसे निवेदन किया जाय की मुझे म्यूजियम देखने और रिकॉर्ड करने दिया जाय।

और जा पहुंचा प्रिंसिपल प्रोफेसर आलोक कुमार सिंह के पास और जब उनसे मिला तो आशा के विपरीत आगे बढ़ के स्वागत किया और जब मैंने उनसे मिलने का कारण बताया तो बहुत ही खुश हुए कि उनके टीडी कालेज के म्यूजियम की चर्चा दूर दूर तक है। म्यूजियम दिखाने का इंतजाम उन्होंने तत्काल किया। म्यूजियम में डॉ प्रदीप सिंह मिले जिन्होंने संक्षेप में हर पत्थर और मूर्ति के बारे में बताया। मुझे जौनपुर के टीडी कालेज के प्रिंसिपल से ऐसे सहयोग की आशा नहीं थी जो यकीनन मेरी गलती थी या पुराना कड़वा अनुभव… इस संग्रहालय में दसवीं और बारहवीं शताब्दी के बहुत से पत्थर रखे हैं जो जौनपुर में ही खुदाई के दौरान मिले थे लेकिन दुख की बात है कि अधिकतर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है।

जिज्ञासा वश म्यूजियम देखने के बाद प्रो. आलोक कुमार सिंह से फिर मिला वे अपने घर ले गए और मैंने उनसे निवेदन किया की जौनपुर में म्यूजियम की कमी है इसलिए संभव हो तो इसी म्यूजियम को बढ़ाए। उन्होंने आश्वासन दिया की वे इस पर विचार करेंगे। उनसे जितने समय बात चीत किया तो मुझे यह दिखाई दिया की उन्हें अपने स्टूडेंट्स के भविष्य की चिंता है और किस प्रकार से शिक्षक गण के सहयोग से बच्चों की शिक्षा पर अधिक से अधिक अधिक ध्यान दे सके। मुझे खुशी इस बात की हुई कि जौनपुर में बहुत दिनो बाद किसी अच्छे प्रिंसिपल से मिल रहा था। एक ऐसी शक्सियत जिससे जितनी बात करो उत्सुकता उनके और उनकी सोच के बारे में जानने की और अधिक बढ़ती जाती थी। उनसे निवेदन किया कि आप कुछ अपने टीडी कालेज के बारे में कैमरे के सामने बताए और अपने स्टूडेंट्स को कोई संदेश दें जो उनको इनका भविष्य बनाने में काम आये। उनकी बातें उनके शब्द उनके पैगाम आपके सामने इस वीडियो में हैं।

आपको बताता चलूं की जौनपुर की शान तिलकधारी महाविद्यालय की स्थापना ठाकुर तिलकधारी सिंह ने की थी। 1914 में इसकी शुरुआत मिडिल स्कूल से हुई और 1916 में हाई स्कूल, 1940 में इंटरमीडिएट,1947 में स्नातक,1979 में स्नातकोत्तर, से गुजरता हुआ आज एक उच्च स्तरीय संस्था के रूप में अपनी पहचान रखता है। शिक्षक किसी भी राष्ट्र की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करनें का सबसे सशक्त माध्यम हैं और प्रिंसिपल प्रोफसर आलोक कुमार को देख कर ऐसा महसूस हुआ कि वे इस महाविद्यालय को काफी आगे तक ले जायेंगे।
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